हाथरस घटना को लेकर दलित वोट की राजनीतिक घेराबंदी की तैयारी, भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने, जेडीयू हुई डिफेंसिव

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नई दिल्ली : कांग्रेस हाथरस मुद्दे को लेकर लगातार अक्रामक है। पार्टी बिहार विधानसभा और मध्य प्रदेश उपचुनाव में इस मुद्दे पर भाजपा-जेडीयू गठबंधन को घेरने की तैयारी कर रही है। पार्टी की कोशिश है कि 2015 की तरह इस बार भी अधिक से अधिक सुरक्षित सीट पर जीत दर्ज की जाए। इसलिए, कांग्रेस-राजद गठबंधन चुनाव प्रचार के दौरान इस मुद्दे को उठाएंगे।
बिहार विधानसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों की नजर दलित मतदाताओं पर हैं। सभी पार्टियां दलितों का भरोसा जीतने की कोशिश कर रही हैं। यह परिणाम तय करेंगे कि हाथरस मामले का चुनाव पर कितना असर पड़ा, पर इससे कांग्रेस और दूसरी पार्टियों को भाजपा-जेडीयू को घेरने का मौका मिल गया है।
वहीं, लोजपा से अलग होने से आक्रामकता बढ़ी है। दलित मतदाताओं की अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अनुसूचित जाति या जनजाति के किसी व्यक्ति की हत्या होने पर परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की घोषणा की। इसके साथ जीतन राम मांझी को अपने पाले में लाने के साथ अशोक चौधरी को बिहार जेडीयू का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया।
जेडीयू की पूरी कोशिश है कि दलितों का उस पर भरोसा बरकरार रहे। क्योकि, 2015 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण के बारे में दिए बयान से उन्हें 10 सुरक्षित सीट पर जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। इसके साथ वह कांग्रेस-राजद के साथ गठबंधन में चुनाव लड़े थे। इस बार भाजपा के साथ गठबंधन में है। कांग्रेस और राजद हाथरस मामले को लेकर भाजपा पर अक्रामक है। पार्टी चुनाव प्रचार में इस मुद्दे को उठाएगी। पर सुरक्षित सीट पर पार्टी इस मुद्दे को और जोर शोर से उठाएगी। पार्टी ने दलित नेताओं को इन क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपी है। प्रचार रणनीति से जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि हम लोजपा के साथ जेडीयू और भाजपा के व्यवहार को भी मुद्दा बनाएंगे।
बिहार में 16 फीसदी दलित
बिहार में दलित मतदाताओं की तादाद 16 फीसदी है। विधानसभा में 38 सीट आरक्षित हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में राजद ने 14, कांग्रेस-भाजपा ने पांच-पांच और जेडीयू ने दस सीट जीती थी। बाकी सीट अन्य दलों को मिली थी। ऐसे में कांग्रेस और राजद दोनों की कोशिश होगी कि वह इन सीट पर अपना दबदबा बरकरार रखे। हालांकि, सभी दलों के लिए यह एक चुनौती है। बसपा बिहार में इस बार लोक समता पार्टी और एआईएमआईएम के मिलकर चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस के एक नेता ने स्वीकार किया है कि पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार बसपा कड़ी चुनौती देगी। क्योंकि, कई सीट पर दलित-मुसलिम समीकरण हार-जीत का फैसला कर सकते हैं। ऐसा होता है तो इसका सीधा नुकसान कांग्रेस-राजद गठबंधन को होगा।
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलेपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार का कहना है कि जब कभी कोई इस तरह की बड़ी घटना घटती है, तो वह चुनावी मुद्दा बनती है। पर यह यूपी की घटना है, इसलिए बिहार में इसका बहुत प्रभाव नहीं पड़ेगा। यूपी में चुनाव होते, तो असर पड़ता।