वरिष्ठ पत्रकार जावेद रहमानी: उर्दू पत्रकारिता, साहित्य और संस्कृति की एक बुलंद आवाज़

✍️ डॉ. एजाज़ पॉपुलर मेरठी

(प्रख्यात साहित्यकार, शायर एवं लेखक)

जीवन की लंबी यात्रा में कुछ व्यक्तियों से हमारा परिचय केवल औपचारिक मुलाक़ातों तक सीमित रहता है, जबकि कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो अपने आचरण, विचारों, आत्मीयता और निरंतर संघर्ष के कारण हमारे हृदय और मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। उनके साथ संबंध केवल व्यक्तिगत परिचय नहीं रह जाता, बल्कि साहित्यिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक आत्मीयता का एक सुंदर अध्याय बन जाता है।

उर्दू पत्रकारिता और साहित्य जगत में मेरे पुराने मित्र जावेद रहमानी का नाम ऐसी ही सक्रिय और सम्मानित शख़्सियतों में शामिल है, जिन्होंने अपनी मेहनत, लगन और मातृभाषा के प्रति गहरे समर्पण से एक विशिष्ट पहचान बनाई है।

दिल्ली की साहित्यिक गोष्ठियों, सेमिनारों, मुशायरों और सांस्कृतिक आयोजनों में जावेद रहमानी से मेरी मुलाक़ातें वर्षों से होती रही हैं। उनके व्यक्तित्व की जो विशेषताएँ मुझे हमेशा प्रभावित करती रही हैं, उनमें उनकी सादगी, विनम्रता, मिलनसार स्वभाव, उदारता और साहित्यकारों के प्रति सम्मान की भावना प्रमुख हैं।

बिहार के राज्यपाल महामहिम लिफ़्टेनेंट जेनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन को जावेद रहमानी अपने पिता स्वर्गीय अतिक मुज़फ़्फ़रपुरी पर लिखी पुस्तक भेंट करते हुए ।

मेरे विचार में किसी व्यक्ति की वास्तविक महानता उसके पद, प्रतिष्ठा या पुरस्कारों से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, व्यवहार और समाज के प्रति योगदान से निर्धारित होती है। इस दृष्टि से जावेद रहमानी के जीवन में अनेक प्रेरणादायक पहलू दिखाई देते हैं।

विरासत में मिला साहित्य और पत्रकारिता का संस्कार

जावेद रहमानी अपने पिता, प्रख्यात साहित्यकार स्वर्गीय अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी के जीवन एवं साहित्यिक सेवाओं पर आधारित पुस्तक ‘अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी : हयात व ख़िदमात’ डॉ अतहर फ़ारूक़ी, महासचिव, अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू (हिन्द) नई दिल्ली को भेंट करते हुए।

जावेद रहमानी के व्यक्तित्व और पत्रकारिता के प्रति उनके समर्पण को समझने के लिए उस पारिवारिक वातावरण को जानना आवश्यक है, जिसमें उनका पालन-पोषण हुआ।

उनके पिता स्वर्गीय अतीक मुज़फ़्फ़रपुरी उर्दू पत्रकारिता और साहित्य की एक प्रतिष्ठित एवं गंभीर शख़्सियत थे। उन्होंने अपना जीवन उर्दू भाषा के संरक्षण, उसके प्रचार-प्रसार और पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया था।

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री भारत सरकार श्री शिवराज सिंह चौहान से जावेद रहमानी सम्मानित होते हुए।

उनके लिए पत्रकारिता केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि एक सामाजिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक दायित्व थी। उनका विश्वास था कि किसी भाषा का अस्तित्व केवल पुस्तकों और शब्दकोशों में नहीं, बल्कि समाचारपत्रों, पत्रिकाओं, साहित्यिक गतिविधियों और जनसामान्य की अभिव्यक्ति में सुरक्षित रहता है।

जावेद रहमानी अपनी पुस्तक श्री ज़मा ख़ान, अल्प संख्यक मंत्री बिहार सरकार को भेंट करते हुए।

कलम की प्रतिबद्धता, साहित्य से गहरा लगाव और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पण ने जावेद रहमानी को पत्रकारिता एवं अदबी दुनिया में दिलाई विशिष्ट पहचान।

‘सायबान’ : एक सपने से पत्रकारिता की पहचान तक।

उर्दू साहित्य के प्रख्यात विद्वान, आलोचक एवं लेखक स्वर्गीय शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी को पुष्पगुच्छ भेंट कर उनका सम्मान करते वरिष्ठ पत्रकार जावेद रहमानी।

उर्दू पत्रकारिता के इतिहास में कुछ समाचारपत्र केवल प्रकाशन नहीं होते, बल्कि अपने समय की वैचारिक आवश्यकताओं और सांस्कृतिक पहचान के प्रतिनिधि बन जाते हैं।

‘’सायबान’ की कहानी भी ऐसे ही एक सपने, संघर्ष और संकल्प की कहानी है।

देश के जाने-माने वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार के साथ एक आत्मीय मुलाक़ात के दौरान वरिष्ठ पत्रकार जावेद रहमानी।

वर्ष 2003 में स्वर्गीय अतीक मुज़फ़्फ़रपुरी ने नई दिल्ली से उर्दू पाक्षिक पत्रिका ‘साइबान’ का प्रकाशन प्रारंभ किया। इसके पीछे उर्दू भाषा के प्रति गहरा लगाव और पाठकों को एक गंभीर तथा विश्वसनीय पत्रकारिता मंच उपलब्ध कराने की भावना थी।

उस समय उर्दू पत्रकारिता आर्थिक कठिनाइयों, सीमित संसाधनों, विज्ञापनों की कमी और प्रकाशन संबंधी अनेक चुनौतियों से जूझ रही थी। ऐसे वातावरण में नई पत्रिका का प्रकाशन शुरू करना साहसिक निर्णय था।

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं भारत सरकार के पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री, प्रख्यात साहित्यकार डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के साथ एक सौहार्दपूर्ण मुलाक़ात के दौरान उर्दू पत्रकारिता एवं साहित्य जगत के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं साहित्यिक चिंतक जावेद रहमानी।

वर्ष 2008 में इस पत्रकारिता यात्रा ने एक नया मोड़ लिया, जब जावेद रहमानी ने अपने पिता की स्थापित परंपरा को विस्तार देते हुए ‘साइबान’ का दैनिक समाचारपत्र के रूप में प्रकाशन प्रारंभ किया।

किसी पाक्षिक पत्रिका को दैनिक समाचारपत्र में परिवर्तित करना आसान कार्य नहीं होता। इसके लिए नियमित समाचार संकलन, संपादकीय व्यवस्था, मुद्रण, वितरण और कुशल प्रबंधन की आवश्यकता होती है।

जावेद रहमानी ने इन चुनौतियों को स्वीकार किया और अपने पिता के सपने को नई दिशा प्रदान की।

आज दैनिक ‘सायबान’ का प्रकाशन नई दिल्ली, भोपाल, ग़ाज़ियाबाद, रांची और मुज़फ़्फ़रपुर जैसे पाँच महत्वपूर्ण केंद्रों से अलग-अलग संस्करणों के रूप में हो रहा है।

यह उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय है कि वर्तमान परिस्थितियों में किसी एक शहर से उर्दू दैनिक का नियमित प्रकाशन बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण माना जाता है।

इमारत-ए-शरिया, बिहार, झारखंड एवं ओडिशा के अमीर-ए-शरीअत, प्रतिष्ठित धार्मिक एवं सामाजिक व्यक्तित्व हज़रत मौलाना सैयद अहमद वली फ़ैसल रहमानी के साथ एक आत्मीय एवं सौहार्दपूर्ण मुलाक़ात के दौरान उर्दू पत्रकारिता और साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं साहित्यिक चिंतक जावेद रहमानी।

विभिन्न राज्यों से समाचारपत्र का प्रकाशन स्थानीय समस्याओं, राजनीतिक गतिविधियों, सामाजिक सरोकारों, शिक्षा और साहित्य से संबंधित समाचारों को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाने का माध्यम बना है। मेरे विचार में इस उपलब्धि का वास्तविक महत्व केवल पाँच संस्करणों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस संकल्प का प्रमाण है जिसके माध्यम से एक पारिवारिक पत्रकारिता परंपरा को व्यापक पहचान मिली।

तीन दशकों से अधिक का पत्रकारिता सफ़र

जावेद रहमानी का पत्रकारिता जीवन तीन दशकों से अधिक समय पर फैला हुआ है। यह केवल वर्षों की संख्या नहीं, बल्कि अनुभव, संघर्ष, सामाजिक सरोकार और निरंतर सक्रियता की एक लंबी यात्रा है।

पत्रकारिता ऐसा क्षेत्र है जहाँ प्रतिदिन नई परिस्थितियाँ और नई चुनौतियाँ सामने आती हैं। यहाँ सफलता के लिए केवल समाचारों की गति ही पर्याप्त नहीं, बल्कि निष्पक्षता, अध्ययन, धैर्य और समाज की समस्याओं के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण भी आवश्यक है। जावेद रहमानी ने पारंपरिक प्रिंट मीडिया के दौर को भी देखा है और डिजिटल पत्रकारिता के बदलते स्वरूप का भी अनुभव किया है।

उनकी पत्रकारिता गतिविधियाँ केवल भारत तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन विशेषकर लंदन, सऊदी अरब और ईरान जैसे देशों की यात्राएँ कीं तथा विभिन्न अवसरों पर पत्रकार के रूप में गतिविधियों में भाग लिया।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव किसी भी पत्रकार की दृष्टि को व्यापक बनाते हैं। विभिन्न देशों की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का अध्ययन अपने समाज की समस्याओं को नए दृष्टिकोण से समझने का अवसर प्रदान करता है। जावेद रहमानी की विदेश यात्राएँ और पत्रकारिता से जुड़ी गतिविधियाँ उनके पेशेवर अनुभव तथा व्यापक संपर्कों का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं।

साहित्यिक विरासत को पुस्तक के रूप में संजोने का प्रयास

पटना स्थित प्रतिष्ठित ख़ुदा बख़्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी के निदेशक प्रो. डॉ. ज़ाहिदुल हक़ को अपने पिता, प्रख्यात साहित्यकार स्वर्गीय अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी के जीवन एवं साहित्यिक सेवाओं पर आधारित पुस्तक ‘अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी : हयात व ख़िदमात’ भेंट करते वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक जावेद रहमानी।

जावेद रहमानी के व्यक्तित्व का एक उल्लेखनीय पहलू उनकी साहित्यिक और संपादकीय रुचि भी है। पत्रकारिता की व्यस्तताओं के बीच उन्होंने साहित्यिक इतिहास और महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों की सेवाओं को दस्तावेज़ी रूप देने की दिशा में भी कार्य किया है। इस संदर्भ में उनके द्वारा संपादित पुस्तक ‘अतीक मुज़फ़्फ़रपुरी : हयात -व- ख़िदमात’ विशेष महत्व रखती है। यह पुस्तक उनके पिता के जीवन, साहित्यिक अभिरुचि और पत्रकारिता के योगदान को संरक्षित करने का प्रयास है।

इसकी विशेषता यह है कि एक पुत्र ने अपने पिता की स्मृतियों को केवल पारिवारिक दायरे तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उनके कार्यों और विचारों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का प्रयास किया।

किसी व्यक्ति के जीवन और योगदान पर पुस्तक तैयार करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं होता, बल्कि उसके समय, संघर्ष, विचारों और उपलब्धियों को ऐतिहासिक संदर्भ में सुरक्षित करना भी होता है।

अतीक मुज़फ़्फ़रपुरी के जीवन का अध्ययन उर्दू पत्रकारिता के उस दौर को समझने में सहायक हो सकता है, जब सीमित संसाधनों के बावजूद भाषा और साहित्य की सेवा का उत्साह बना हुआ था।

मेरे लिए यह प्रसन्नता की बात है कि जावेद रहमानी ने अपने पिता की साहित्यिक और पत्रकारिता संबंधी विरासत को पुस्तक के माध्यम से सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किया।

सरकारी और पत्रकारिता संस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका

जावेद रहमानी की सक्रियता का दायरा समाचारपत्र के प्रकाशन तक सीमित नहीं रहा। वे विभिन्न सरकारी, पत्रकारिता और साहित्यिक संस्थाओं से भी जुड़े रहे हैं।

वे दिल्ली सरकार के अधीन उर्दू अकादमी, दिल्ली की कार्यकारिणी परिषद के सदस्य रह चुके हैं। इसके अतिरिक्त दिल्ली सरकार की मीडिया एक्रेडिटेशन कमेटी में भी सदस्य के रूप में अपनी सेवाएँ दे चुके हैं। उर्दू अकादमी जैसे संस्थान भाषा, साहित्य, शोध और साहित्यकारों के प्रोत्साहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे संस्थानों में अनुभवी पत्रकारों की भागीदारी साहित्य और मीडिया के बीच संवाद को मजबूत बनाने में सहायक होती है।

जावेद रहमानी देश की प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्था प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के आजीवन सदस्य हैं। इसके अतिरिक्त वे फॉरेन करेस्पॉन्डेंट्स क्लब (FCC) के भी आजीवन सदस्य हैं। वे डेमोक्रेटिक प्रेस क्लब में सचिव तथा इंडियन लैंग्वेज जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (ILJA) में महासचिव के रूप में भी जिम्मेदारियाँ निभा चुके हैं। इन संगठनों से उनका जुड़ाव पत्रकारों के आपसी सहयोग, संगठनात्मक गतिविधियों और भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

भारत जैसे बहुभाषी देश में हिंदी, उर्दू तथा अन्य भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता का विशेष महत्व है। ये भाषाएँ आम जनता की समस्याओं, भावनाओं और आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करती हैं। पत्रकारों के अधिकारों, पेशेवर सम्मान और आपसी सहयोग के लिए संगठनात्मक स्तर पर कार्य करना भी पत्रकारिता की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू से दो दशकों का संबंध

जावेद रहमानी के साहित्यिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू (हिंद), नई दिल्ली से उनकी लंबी संबद्धता है। यह संस्था भारतीय उपमहाद्वीप की ऐतिहासिक साहित्यिक संस्थाओं में शामिल है, जिसने उर्दू भाषा, साहित्य, शोध और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। जावेद रहमानी लगभग दो दशकों से इस संस्था के मीडिया कोऑर्डिनेटर के रूप में जुड़े हुए हैं।

साहित्यिक संस्थाओं की गतिविधियों को समाचार माध्यमों तक पहुँचाना, कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार करना और साहित्यकारों तथा पत्रकारों के बीच संवाद स्थापित करना एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

आज जब संचार के माध्यम तेजी से बदल रहे हैं, ऐसे समय में साहित्यिक संस्थाओं और मीडिया के बीच प्रभावी संबंधों की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है। अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू से उनकी लंबी संबद्धता साहित्य और भाषा के प्रति उनके निरंतर लगाव को दर्शाती है।

सामाजिक और शैक्षिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी

जावेद रहमानी पत्रकारिता और साहित्य के साथ सामाजिक तथा शैक्षिक गतिविधियों में भी रुचि रखते हैं। वे शिक्षा सेवा समिति और साइबान फाउंडेशन के महासचिव के रूप में जिम्मेदारियाँ निभा रहे हैं। इन संस्थाओं से उनका जुड़ाव शिक्षा और समाज सेवा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का परिचायक है। किसी भी समाज की प्रगति में शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। शिक्षा व्यक्ति को जागरूकता, आत्मविश्वास और बेहतर भविष्य की दिशा प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त जावेद रहमानी नई दिल्ली स्थित इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर के भी आजीवन सदस्य हैं।

उनकी ये विविध संबद्धताएँ बताती हैं कि वे पत्रकारिता के साथ सामाजिक संबंधों और संस्थागत गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। उन्हें उनकी पत्रकारिता और सामाजिक सेवाओं के लिए विभिन्न संस्थाओं तथा संगठनों की ओर से अनेक सम्मान और पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। हालाँकि मेरा मानना है कि किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान केवल उसके पुरस्कारों से नहीं होती। उसका सबसे बड़ा सम्मान वह विश्वास और प्रतिष्ठा है जो वह अपने कार्यों तथा व्यवहार से अर्जित करता है।

सादगी, आत्मीयता और मानवीय मूल्यों का संगम

इतनी व्यस्तताओं और जिम्मेदारियों के बावजूद जावेद रहमानी के व्यक्तित्व का जो पक्ष मुझे सबसे अधिक प्रभावित करता है, वह उनकी विनम्रता, आत्मीयता और मिलनसार स्वभाव है।

साहित्यिक और सामाजिक जीवन में कुछ लोग अपनी प्रतिष्ठा के कारण दूसरों से दूरी बना लेते हैं, जबकि कुछ व्यक्तित्व अपनी सादगी और अच्छे व्यवहार से लोगों के दिलों में स्थान बना लेते हैं। मैं जावेद रहमानी को इसी दूसरी श्रेणी में रखता हूँ। उनसे मुलाक़ात में अपनापन, बातचीत में शालीनता और व्यवहार में सम्मान का भाव दिखाई देता है। वे साहित्यकारों और पत्रकारों का आदर करते हैं तथा विभिन्न साहित्यिक आयोजनों में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। ज्ञान व्यक्ति को विवेक देता है, साहित्य उसकी संवेदनाओं को समृद्ध करता है और पत्रकारिता उसे समाज की वास्तविकताओं से परिचित कराती है। लेकिन इन सभी गुणों के साथ अच्छा चरित्र और मानवीय व्यवहार जुड़ जाए तो व्यक्तित्व की सुंदरता और बढ़ जाती है। जावेद रहमानी के साथ मेरे पुराने संबंध इसी आत्मीयता और परस्पर सम्मान पर आधारित हैं।

बदलते समय में उर्दू पत्रकारिता की चुनौतियाँ

आज उर्दू पत्रकारिता एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रही है। एक ओर डिजिटल मीडिया और आधुनिक तकनीक ने समाचारों के प्रसार को नई गति प्रदान की है, वहीं दूसरी ओर मुद्रित समाचारपत्र आर्थिक कठिनाइयों, विज्ञापनों की कमी और पाठकों की बदलती आदतों जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में भाषाई पत्रकारिता को अपनी परंपरागत गरिमा बनाए रखते हुए आधुनिक तकनीक के साथ आगे बढ़ना होगा। उर्दू पत्रकारिता का भविष्य केवल संपादकों और पत्रकारों की जिम्मेदारी नहीं है। इसके संरक्षण में साहित्यकारों, शिक्षकों, शिक्षण संस्थानों और पाठकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। हमें नई पीढ़ी को अपनी भाषाई और सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना होगा, ताकि भाषा केवल इतिहास की वस्तु बनकर न रह जाए, बल्कि समाज के जीवंत संवाद का माध्यम बनी रहे। इस संदर्भ में अतीक मुज़फ़्फ़रपुरी की स्थापित पत्रकारिता परंपरा और जावेद रहमानी द्वारा उसे आगे बढ़ाने का प्रयास एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

दो पीढ़ियों की संघर्ष और समर्पण की कहानी

जब मैं जावेद रहमानी के जीवन और उनके योगदान पर विचार करता हूँ तो मेरे सामने दो पीढ़ियों की एक अत्यंत अर्थपूर्ण तस्वीर उभरती है। एक ओर स्वर्गीय अतीक मुज़फ़्फ़रपुरी हैं, जिन्होंने उर्दू पत्रकारिता के सम्मान और अस्तित्व की रक्षा के लिए जीवन समर्पित किया तथा वर्ष 2003 में ‘सायबान पाक्षिक की शुरुआत दिल्ली से की थी । दूसरी ओर उनके बड़े पुत्र जावेद रहमानी हैं, जिन्होंने उस विरासत को जिम्मेदारी के साथ स्वीकार किया, वर्ष 2008 में दैनिक साइबान का प्रकाशन प्रारंभ किया और उसे पाँच महत्वपूर्ण केंद्रों तक विस्तारित किया। यह केवल पिता और पुत्र की कहानी नहीं, बल्कि एक साहित्यिक, सांस्कृतिक और पत्रकारिता परंपरा के निरंतर प्रवाह की कहानी है।

विरासत केवल संपत्ति या भौतिक संसाधनों का नाम नहीं होती। कुछ विरासतें विचारों, संस्कारों, ज्ञान, चरित्र और समाज के प्रति समर्पण के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती हैं।

ऐसी विरासत का महत्व इसलिए अधिक होता है क्योंकि उसका लाभ केवल किसी परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज को भी प्राप्त होता है। जावेद रहमानी ने अपने पिता से प्राप्त साहित्यिक और पत्रकारिता की धरोहर को न केवल संरक्षित किया, बल्कि उसे आगे बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास किए। मेरे विचार में यही उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। मैं अपने इस पुराने साहित्यिक मित्र के उज्ज्वल भविष्य, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करता हूँ। ईश्वर उन्हें और अधिक ऊर्जा, साहस तथा पत्रकारिता एवं साहित्य की सेवा करने की शक्ति प्रदान करे।

मेरी कामना है उर्दू कि दैनिक सायबान निरंतर प्रगति करे और जावेद रहमानी अपने पिता स्वर्गीय अतीक मुज़फ़्फ़रपुरी की गौरवशाली परंपरा को इसी समर्पण और निष्ठा के साथ आगे बढ़ाते रहें। अंत में इतना ही कहना चाहूँगा कि किसी भाषा और साहित्य का इतिहास केवल महान कवियों, लेखकों और विद्वानों से नहीं बनता, बल्कि उन समर्पित पत्रकारों, संपादकों और संस्थान निर्माताओं का योगदान भी उसमें महत्वपूर्ण होता है, जो कठिन परिस्थितियों में भी भाषा और विचारों की ज्योति जलाए रखते हैं।

जावेद रहमानी इसी परंपरा के एक सक्रिय प्रतिनिधि हैं। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्ची विरासत वही है, जिसे अगली पीढ़ी केवल संभालती नहीं, बल्कि अपने परिश्रम और संकल्प से नई ऊँचाइयों तक पहुँचाती है।

(डॉ. एजाज़ पॉपुलर मेरठी प्रसिद्ध साहित्यकार, शायर एवं लेखक हैं)