विविध धर्म-ग्रंथों में निहित ज्ञानोदय के संदेश से महकी दिल्ली की संगोष्ठी।
डॉ. एम. डी. थॉमस ने अत्यंत मार्मिक ढंग से समझाया कि धर्म मनुष्य के लिए है और इसे कट्टरता से मुक्त रखकर दैनिक जीवन में उतारना ही वास्तविक ज्ञानोदय है।
नई दिल्ली: ऑफ हार्मनी एंड पीस स्टडीज’ और ‘बुद्ध त्रिरत्न मिशन’ के संयुक्त तत्वावधान में एक विशेष गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य विषय ‘ज्ञानोदय—विविध धर्म-ग्रंथों में’ रखा गया था। कार्यक्रम की शुरुआत में बुद्ध त्रिरत्न मिशन के महासचिव श्री सुब्रतो बरुआ ने सभी अतिथियों का स्वागत किया, जिसके बाद सत्र की अध्यक्षता कर रहे संस्थान के संस्थापक निदेशक फादर डॉ. एम. डी. थॉमस ने अपने उद्घाटन संबोधन में स्पष्ट किया कि ज्ञानोदय केवल बौद्ध धर्म की अवधारणा नहीं बल्कि पूरी मानवता की साझा विरासत है और यह संस्थान की ‘क्रॉस-स्क्रिप्टुरल वैल्यूज’ श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए भिक्खु डॉ. नंदा ने बौद्ध धर्म में ज्ञानोदय को दुखों से मुक्ति और निर्वाण का मार्ग बताया, तो वहीं डॉ. अजय जैन ने जैन दर्शन के ‘केवल ज्ञान’ और पांच प्रकार के ज्ञानों की चर्चा करते हुए आत्मा की शुद्धि पर बल दिया।
इस्लामी दृष्टिकोण रखते हुए प्रो. जुनैद हारिस और प्रो. सलीम इंजीनियर ने कुरान के ‘वहदत-ए-दीन’ और नैतिक आचरण यानी ‘अखलाक’ को ज्ञानोदय का आधार बताया, जबकि आर्य रवि देव गुप्त ने वेदों के ‘नित्य’ और ‘नैमित्तिक’ ज्ञान के माध्यम से आध्यात्मिक अनुशासन की महत्ता समझाई। इसी कड़ी में एडवोकेट मोनिका शर्मा ने हिंदू शास्त्रों के अनुसार मोक्ष और विचारों की पवित्रता को अनिवार्य बताया, वहीं सरदार हरविंदर सिंह लांबा और सरदार सुरजीत सिंह आजाद ने गुरु ग्रंथ साहिब के ‘इक ओंकार’ और ‘दूसरों में बुराई न देखने’ के संदेश को साझा किया। चर्चा को विस्तार देते हुए प्रो. टी. के. मिश्रा ने युवाओं में आध्यात्मिक जागरूकता और कर्तव्य पालन को ही सच्चा धर्म कहा, जबकि श्री यश धमीजा ने ‘नेति-नेति’ के सिद्धांत से शाश्वत सत्य की प्राप्ति का मार्ग दिखाया। डॉ. विक गैफनी और डॉ. चांद भारद्वाज ने मानवता को एक साझा यात्रा और ‘कॉस्मिक स्ट्रक्चर’ का हिस्सा बताते हुए आंतरिक ज्ञान पर जोर दिया, वहीं श्री अनिरुद्ध कुमार और जनाब फिरोज बख्त अहमद ने अहंकार त्यागने और युद्ध के बजाय बुद्ध की राह चुनने की अपील की। सूफी विद्वान जनाब गुलाम रसूल देहलवी ने विविधता को इंद्रधनुष की तरह सुंदर बताया और सुश्री नीलाक्षी राजखोवा ने सत्यनिष्ठा को सभी मूल्यों की नींव करार दिया, जिसके साथ ही डॉ. गोपाल जी ने भगवद गीता और योग के समन्वय से ज्ञानोदय की प्राप्ति की बात कही। समापन भाषण में फादर डॉ. एम. डी. थॉमस ने अत्यंत मार्मिक ढंग से समझाया कि धर्म मनुष्य के लिए है और इसे कट्टरता से मुक्त रखकर दैनिक जीवन में उतारना ही वास्तविक ज्ञानोदय है। अंत में श्री सुब्रतो बरुआ ने सभी वक्ताओं और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए इस सफल संवाद का समापन किया।
