ट्रंप की डेडलाइन और तुर्की की बेचैनी: युद्ध से बचने के लिए तुर्की ने बिछाई कूटनीतिक बिसात।

तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप अर्दोआन ने स्पष्ट किया है कि उनका देश उन साजिशों का हिस्सा नहीं बनेगा, जिनका जाल उनके लिए बुना जा रहा है।

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ईरान-अमेरिका युद्ध: ‘शांति दूत’ बनने की राह पर तुर्की; राष्ट्रपति अर्दोआन ने कहा- “हम किसी के बिछाए जाल में नहीं फंसेंगे”

अंकारा/इस्तांबुल: पश्चिम एशिया में अमेरिका, इसराइल और ईरान के बीच छिड़े भीषण संघर्ष ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इस युद्ध की आंच से खुद को बचाने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए तुर्की ने एक बेहद सतर्क और संतुलित ‘स्वतंत्र कूटनीति’ (Strategic Autonomy) का रास्ता चुना है।

तुर्की की प्राथमिकता: “सुरक्षा और तटस्थता”

युद्ध की शुरुआत के बाद से ही तुर्की के अधिकारियों ने किसी एक पक्ष को सीधे दोषी ठहराने के बजाय संघर्ष के खतरों पर ज़ोर दिया है। राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने देश को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया:

“हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता देश की सुरक्षा है। हम तुर्की को इस संकट से बचाने के लिए दृढ़ संकल्प हैं और उस जाल में नहीं फंसेंगे जिसमें कुछ लोग हमें फंसाना चाहते हैं।”

कूटनीतिक घेराबंदी और मध्यस्थता की कोशिशें

तुर्की केवल मूकदर्शक नहीं बना है, बल्कि वह सक्रिय रूप से ‘शांति कूटनीति’ में जुटा है।

  • त्रिकोणीय वार्ता: तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान लगातार दोहा, इस्लामाबाद और अन्य खाड़ी देशों के संपर्क में हैं। 29 मार्च को इस्लामाबाद में तुर्की-मिस्र-पाकिस्तान और सऊदी अरब के विदेश मंत्रियों की बैठक इस दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

  • संपर्क बनाए रखना: तुर्की ने ईरान और अमेरिका दोनों के साथ संवाद के रास्ते खुले रखे हैं ताकि बातचीत के ज़रिए युद्ध को जल्द खत्म किया जा सके।

  • दावा: सरकार के करीबी लेखक अब्दुलकादिर साल्वी के अनुसार, तुर्की की मध्यस्थता ने खाड़ी देशों और ईरान के बीच एक और बड़े संभावित युद्ध को टालने में मदद की है।

तुर्की के लिए क्या है जोखिम?

अंकारा की इस सावधानी के पीछे कई गहरे कारण और चिंताएं हैं:

  1. शरणार्थी संकट: ईरान के साथ एक लंबी सीमा साझा करने के कारण तुर्की को डर है कि युद्ध के कारण बड़ी संख्या में विस्थापित लोग उसकी सीमाओं की ओर रुख कर सकते हैं।

  2. इसराइल का बढ़ता प्रभाव: तुर्की के विश्लेषकों का मानना है कि इस युद्ध से क्षेत्र में इसराइल का प्रभाव अत्यधिक बढ़ जाएगा, जो भविष्य में तुर्की के हितों के लिए खतरा बन सकता है।

  3. अमेरिका के साथ जटिल संबंध: ट्रंप और अर्दोआन के बीच निजी तालमेल के बावजूद, रूस से S-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध और F-35 लड़ाकू विमानों की डील अभी भी तनाव का विषय बनी हुई है।

नेतन्याहू और ट्रंप पर रुख

राष्ट्रपति अर्दोआन ने इस पूरे संकट के लिए इसराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि यह युद्ध नेतन्याहू के राजनीतिक जीवन को बचाने के लिए लड़ा जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि अर्दोआन अब तक अमेरिका की सीधी आलोचना से बचते रहे हैं, हालांकि तुर्की के मीडिया में अब राष्ट्रपति ट्रंप के कड़े रुख की निंदा बढ़ने लगी है।

क्या कहती है तुर्की की जनता?

तुर्की के भीतर सरकार की ‘तटस्थ’ नीति को व्यापक जनसमर्थन मिल रहा है। मेट्रोपोल (Metropoll) के हालिया सर्वेक्षण के अनुसार:

  • 68% तुर्की नागरिक चाहते हैं कि देश इस युद्ध में तटस्थ (Neutral) रहे।

  • केवल 22.6% लोग ईरान के समर्थन में हैं।

  • अमेरिका और इसराइल के समर्थन में मात्र 1.2% लोग हैं।


तुर्की फिलहाल “भाईचारे और अच्छे पड़ोसी” के सिद्धांतों का पालन करते हुए एक ऐसी लकीर खींच रहा है, जहाँ वह न तो ईरान का सक्रिय सैन्य सहयोगी बन रहा है और न ही अमेरिकी गठबंधन का हिस्सा। अंकारा का पूरा ज़ोर इस बात पर है कि युद्ध को क्षेत्र से बाहर फैलने से रोका जाए और अपनी आर्थिक व रणनीतिक स्वायत्तता को सुरक्षित रखा जाए।