गंगा-जमुनी तहजीब पर प्रहार: सूर्य चौहान की हत्या और साझी विरासत के यक्ष प्रश्न

भारत की सनातन संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और सामाजिक समरसता के शाश्वत सिद्धांतों पर टिकी है। इसी सह-अस्तित्व के बल पर विभिन्न समुदायों के लोग सदियों से इस पावन राष्ट्र-भूमि पर एक साथ रहते आए हैं। लेकिन जब आस्था के पवित्र पर्वों की आड़ में हिंसक प्रवृत्तियों को अंजाम दिया जाता है, तो आपसी विश्वास और गंगा-जमुनी तहजीब के ताने-बाने पर गहरा आघात लगता है। हाल ही में गाजियाबाद के खोड़ा क्षेत्र में घटित दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने प्रबुद्ध समाज को गहरे चिंतन में डाल दिया है। ग्यारहवीं कक्षा के होनहार छात्र सूर्य प्रताप चौहान की जिस प्रकार हत्या कर दी गई, उसने न केवल एक परिवार का भविष्य अंधकारमय कर दिया, बल्कि हमारी साझी विरासत के समक्ष गंभीर यक्ष प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
*त्याग बनाम अहंकार: पावन पर्व और सूर्य की निर्दोषिता*
ईद-उल-अजहा का पावन पर्व मनुष्य को अपने भीतर के हिंसक अहंकार, क्रोध और पाशविक प्रवृत्तियों की कुर्बानी देकर त्याग व समर्पण का मार्ग अपनाने का संदेश देता है। यह पर्व सिखाता है कि इंसान समाज में शांति और सौहार्द के लिए अपने अहम को विसर्जित करे। परंतु, इस पावन अवसर पर असद और उसके सहयोगियों द्वारा छात्र सूर्य प्रताप चौहान के साथ किया गया कृत्य इसी आध्यात्मिक संदेश के सर्वथा विपरीत है। जहाँ इस दिन समाज को बंधुत्व और अमन की मिसाल पेश करनी थी, वहाँ इस हिंसात्मक मानसिकता ने संपूर्ण समाज को आहत किया है। किसी निर्दोष बालक की हत्या न केवल वैधानिक रूप से गंभीर अपराध है, बल्कि यह हमारी सदियों पुरानी साझी संस्कृति और आपसी विश्वास की बुनियाद पर भी गहरा आघात है।
*_डिजिटल कट्टरपंथ: सूरह इकरा की सीख और भड़काऊ उपदेशकों का छद्म जाल_*
इस्लाम की मूल परंपरा की बुनियाद जिस प्रथम आयत पर टिकी है, वह ‘सूरह इकरा’ है, जिसका सीधा अर्थ है: ‘पढ़ो’। इसकी मूल सीख यही है कि समाज अपने बच्चों को आधुनिक, प्रगतिशील और चरित्र-निर्माण करने वाली शिक्षा दे, जो उन्हें विवेकशील नागरिक बनाए।
परंतु आज की विडंबना यह है कि युवा पीढ़ी का एक हिस्सा इस शैक्षणिक संदेश से विमुख हो रहा है। इंटरनेट के इस दौर में कट्टरपंथी तत्वों ने सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं की वैचारिक सोच को प्रभावित करने का प्रयास किया है। ये तत्व धार्मिक ग्रंथों की आधी-अधूरी और विकृत व्याख्याएं परोसकर अपरिपक्व युवाओं को गुमराह कर रहे हैं। जब युवा वर्ग वास्तविक ज्ञान के बजाय ऐसे भड़काऊ अजेंडे के जाल में फंस जाता है, तो समाज में हिंसक चरित्र पैदा होते हैं।
*_वैयक्तिक अपराध, सामूहिक लांछन और उन्मादी तंत्र की जवाबदेही_*
यहाँ एक सैद्धांतिक स्पष्टता आवश्यक है कि किसी भी अपराधी की व्यक्तिगत क्रूरता को संपूर्ण मजहब अथवा समुदाय के माथे पर नहीं मढ़ा जा सकता। जब किसी जघन्य अपराध को समूचे पंथ से जोड़कर पूरे समाज को लांछित किया जाता है, तो इससे केवल अविश्वास की खाई चौड़ी होती है। स्वयं पवित्र ग्रंथों में भी अन्य समाजों के साथ समन्वय और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का निर्देश दिया गया है।
इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि समाज अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है। इस सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि उस ‘उन्मादी तंत्र’ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जो घृणा का पाठ पढ़ाकर हिंसक चरित्रों का निर्माण करता है। जब तक समाज के भीतर छिपे ऐसे नफरती तत्वों और ऑनलाइन कट्टरपंथ को बेनकाब नहीं किया जाएगा, तब तक इस मानसिकता पर पूर्ण विराम लगाना कठिन है। उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी के विरुद्ध की गई कार्रवाई और सह-आरोपियों की गिरफ्तारी यह कड़ा संदेश देती है कि कानून के राज में अपराधियों के लिए कोई स्थान नहीं है।
*एक ही पूर्वज, एक ही मूल: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का संकल्प*
इस वैचारिक संकट के दौर में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की राष्ट्रभक्त सोच अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है। संगठन के मार्गदर्शक आदरणीय इंद्रेश कुमार जी के संरक्षण में यह संगठन देशव्यापी चेतना जगा रहा है कि भारत भूमि पर रहने वाले प्रत्येक नागरिक का मूल और उसके पूर्वज एक हैं। हम सब एक ही सनातन विरासत की संतानें हैं। मंच की स्पष्ट मान्यता है कि जब तक युवा पीढ़ी अपने पूर्वजों के उच्च मानवीय आदर्शों और साझी सांस्कृतिक विरासत का स्मरण नहीं रखेगी, तब तक समाज सुरक्षित नहीं रह सकता। यह संगठन युवाओं के बीच जाकर उन्हें कट्टरपंथ के भड़काऊ अजेंडे से बाहर निकालने का प्रयास कर रहा है। मंच का आह्वान है कि मजहबी संकीर्णता के बंधनों को तोड़कर मातृभूमि की सेवा को अपना कर्तव्य माना जाए।
सूर्या चौहान की इस निर्मम हत्या पर केवल दुख प्रकट करना पर्याप्त नहीं है। आज समय की मांग है कि हम अपने पूर्वजों के उन सनातन संस्कारों को पुनर्जीवित करें जो जोड़ना सिखाते हैं, तोड़ना नहीं। जब तक देश का युवा संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर ज्ञान की वास्तविक राह को आत्मसात नहीं करेगा, तब तक सामाजिक समरसता का संकल्प अधूरा है। कानून अपराधियों को सजा देगा, पर समाज के रूप में हमें जागना होगा। हमें राष्ट्र के प्रति अपनी निष्ठा सिद्ध करते हुए आदरणीय इंद्रेश कुमार जी के नेतृत्व में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच द्वारा दिए गए संदेश को जन-जन तक पहुंचाना होगा।
*”राष्ट्र सर्वप्रथम, राष्ट्र सर्वात्म, राष्ट्र सर्वोपरि”_*
अपनी सनातन संस्कृति की साझी जड़ों का स्मरण, देशहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देना और मातृभूमि के लिए दृढ़ रहना ही खोड़ा जैसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति रोकने का मार्ग है। यह वैचारिक जागरण अब हम सबका परम राष्ट्रीय कर्तव्य है।
