अहंकार सर्वत्र वर्जयेत” — वैश्विक शक्ति-राजनीति के बीच भारत का संतुलित संदेश..

प्रोफेसर गीता सिंह निदेशक CPDHE, दिल्ली यूनिवर्सिटी

आज का विश्व एक गहरे संक्रमण काल से गुजर रहा है। महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्ष और वैचारिक टकराव वैश्विक वातावरण को अस्थिर बना रहे हैं। ऐसे समय में कूटनीति का उद्देश्य तनाव कम करना और स्थिरता स्थापित करना होना चाहिए, किंतु कई बार अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसी परिस्थितियाँ बनती हैं जहाँ शब्द और दावे वास्तविकता से अधिक नाटकीय प्रतीत होते हैं।

…हाल के घटनाक्रम इसी प्रकार के विरोधाभास को सामने लाते हैं। कुछ समय पहले तक Donald Trump के वक्तव्यों में ऐसी कठोर भाषा सुनाई देती थी जिसमें यह संकेत दिया गया कि यदि आवश्यकता पड़ी तो किसी सभ्यता को “एक रात में समाप्त” किया जा सकता है।
… यह भाषा शक्ति के अहंकार का प्रतीक थी। किंतु वही राजनीतिक विमर्श अब यह कहता दिखाई देता है कि Iran के साथ बातचीत की संभावनाएँ सकारात्मक हैं और उसके प्रस्तावों को गंभीरता से देखा जा रहा है।

. ..यह परिवर्तन स्वयं में कूटनीति का सामान्य हिस्सा हो सकता है, क्योंकि संवाद ही संघर्ष का वास्तविक विकल्प है। परंतु यहाँ जो प्रश्न उभरता है वह इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा है। जब अचानक यह कहा जाता है कि संभावित वार्ता के लिए बैठकें Islamabad में आयोजित हो सकती हैं और Pakistan मध्यस्थता की भूमिका निभा सकता है, तब यह स्थिति अनेक जिज्ञासाएँ पैदा करती है।

..मध्यस्थता अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अत्यंत गंभीर और संवेदनशील प्रक्रिया होती है। इसके लिए जिस देश को मध्यस्थ बनाया जाता है, उससे अपेक्षा होती है कि वह विश्वसनीय, संतुलित और व्यापक रूप से स्वीकार्य हो।

…..ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि एक महाशक्ति और एक ऐसे राष्ट्र के बीच यह समीकरण किस आधार पर निर्मित हो रहा है, जिसकी वैश्विक छवि लंबे समय तक आतंकवाद और क्षेत्रीय अस्थिरता की बहसों से जुड़ी रही है।

…यही वह विरोधाभास है जो आज की वैश्विक राजनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। एक ओर शक्ति का दंभ है—जहाँ सभ्यताओं को समाप्त करने की भाषा सुनाई देती है—और दूसरी ओर वही शक्ति अचानक संवाद और मध्यस्थता की बात करती है। यह परिवर्तन सकारात्मक भी हो सकता है, परंतु यदि इसके पीछे केवल रणनीतिक लाभ या राजनीतिक छवि निर्माण हो, तो यह स्थायी समाधान का आधार नहीं बन सकता।

….यहीं पर भारत की सभ्यतागत दृष्टि एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रस्तुत करती है। भारतीय चिंतन सदियों से यह कहता आया है कि शक्ति का उपयोग संतुलन के लिए होना चाहिए, प्रभुत्व के लिए नहीं। इसी भावना को संस्कृत का एक सूत्र अत्यंत स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है— “अहंकार सर्वत्र वर्जयेत”, अर्थात् हर परिस्थिति में अहंकार का त्याग किया जाना चाहिए।….

भारत की यह दृष्टि केवल नैतिक उपदेश नहीं है; यह एक व्यावहारिक कूटनीतिक सिद्धांत भी है। जब राष्ट्र अहंकार से संचालित होते हैं तो संघर्ष बढ़ता है, और जब वे संवाद और सहयोग को प्राथमिकता देते हैं तो स्थिरता का मार्ग खुलता है।

…. इसलिए भारत बार-बार वैश्विक मंचों पर “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को सामने रखता है—एक ऐसी दृष्टि जिसमें विश्व को प्रतिस्पर्धी शक्तियों के समूह के रूप में नहीं, बल्कि एक साझा मानव परिवार के रूप में देखा जाता है।
आज के परिदृश्य में यदि वास्तव में ईरान के साथ संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो यह विश्व के लिए सकारात्मक संकेत हो सकता है। किंतु इस प्रक्रिया की सफलता केवल घोषणाओं या मंचों से नहीं तय होगी; यह इस बात से तय होगी कि क्या इसमें वास्तविक विश्वास, संतुलन और ईमानदारी है।

….विश्व राजनीति को आज यह समझने की आवश्यकता है कि युद्ध की भाषा और शांति की भाषा साथ-साथ नहीं चल सकतीं। यदि सभ्यताओं को मिटाने की चेतावनी दी जाएगी और उसी समय शांति का दावा भी किया जाएगा, तो वह कूटनीति नहीं बल्कि विरोधाभास बन जाएगा।
इसलिए आज का समय विश्व नेतृत्व से एक नए आत्मसंयम की अपेक्षा करता है।

… महाशक्तियों को यह समझना होगा कि उनका प्रभाव तभी सार्थक है जब वह मानवता की रक्षा के लिए उपयोग हो। और जिन राष्ट्रों को मध्यस्थता की भूमिका दी जाती है, उनके लिए भी यह आवश्यक है कि वे विश्वसनीयता और संतुलन की कसौटी पर खरे उतरें।

..भारत का संदेश इसी संदर्भ में अत्यंत स्पष्ट है—
शक्ति का सर्वोच्च रूप विजय नहीं, बल्कि संयम है; और कूटनीति का सर्वोच्च उद्देश्य प्रभुत्व नहीं, बल्कि मानवता की रक्षा है।
यदि विश्व इस सत्य को स्वीकार कर सके, तो शायद आज की अस्थिरता के बीच भी शांति का एक स्थायी मार्ग खोजा जा सकता है।
और तब भारतीय ज्ञान का यह सूत्र केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक राजनीति का मार्गदर्शक सिद्धांत बन सकेगा—
“अहंकार सर्वत्र वर्जयेत।”

(लेखिका निदेशक CPDHE
UNIVERSITY OF DELHI हैं)