औराई को अगले दशक तक नही मिलेगी चचरी युग से मुक्ति
शैलेंद्र कुमार संवादाता-औराई जर्नलिज्म टुडे

औराई:औराई प्रखंड मुजफ्फरपुर व सीतामढी के बोर्डर पर बसा हुआ घनी आवादी वाला 26 पंचायतों का एक प्रखंड है। जहां 1977 से बागमती की पुरानी धारा मुड़कर मुख्य धारा का रुप लेकर तवाही का सबब बन गया । तब से लेकर आज तक यहां की आवादी दर्जनो चचरी पुल के सहारे जिन्दगी काटती आई हैं। बागमती तटबंध निर्माण के बाद एक दर्जन गांव विस्थापित हो गई ,बाढ का पानी सिमटकर अंदर तीन किलोमीटर का दायरा लेते हुए पंद्रह किलोमीटर लम्बाई मे उपज को सदा के निगल गई। वहां की मुख्य फसल जंगली गुड़हन एक किस्म की घास बनी हुई है जहां जंगली जानवरों का वसेरा बना हुआ है ।
यहां की सत्तर प्रतिशत आवादी तब भी चचरी पुल पर आश्रित हुआ करती थी और आज भी आंकड़ा तकरीवन मुख्य सड़क को छोड़कर यही है,भौगौलिक दृष्टी से यहां की बवावट सीतामढी जिले मे आई बाढ से भी संबंध रखता है यहां की आवादी बागमती तटबंध के बाहर सीतामढी जिले से आ रही बाढ के पानी से तवाही मचाता रहा है जिसपर प्लान बनाकर कभी निदान किसी राजनेता व अधिकारीयों ने निकालने का प्रयास नही किया,एक ओर सीतामढी जिले के बेलसंड चंदौली कंसार से होकर पानी मनुषमारा नदी के रास्ते लखनदेई नदी मे मिलकर तवाही मचाता रहा है,दुसरी ओर जोंका नदी मे पुपरी नानपुर के रास्ते बाढ का पानी बालासाथ होते खेतलपुर के रास्ते हजारों हेक्टेयर फसल को नुकसान तो पहुंचाता ही उपर से दो दर्जन ग्रामीण सड़कों को क्षति ग्रस्त कर देता है, कोकिलवारा, खेतलपुर, रतवारा, भलुरा, बभनगावां पुर्वी, चहुंटा टोला,घुसुकपुर टोला ,घनश्यामपुर तकिया टोला,भलुरा,घघरी समेत 22 गांवो मे छह से आठ माह तक बांस बल्ली से बने चचरी पुल का सहारा लेना पड़ता है ।
बागमती तटबंध निर्माण के समय पांच सुईलिस गेट निर्माण की योजना बनी एक सुईलिस गेट कटरा मे बना,लखनदेई नदी का तटबंध दोनो ओर खुला हुआ है जहां तटबंध निर्माण के साथ आधा दर्जन मोड़ पर सुईलिस गेट निर्माण, सीतामढी जिले के नानपुर से आ रहे बाढ के पानी पर नहर की खुदाई कर ही बाढ व चचरी यूग से मुक्ती मिल सकती है। जिसपर मन से प्लान बनाकर काम किया जाय तो दस वर्ष समय लगेगा।
