प्रवासी मजदूरों की परेशानियों पर आधारित ममता शुक्ला की अनोखी नज़्म।
प्रवासी श्रामिक
*ममता शुक्लासावला चेहरा लिएबड़ी आँखों में सपना लिएशायद बारह बरस की प्रचड भूख ही थीजो मेरे काले फटे होटो परहाशिये सी लिखी थीज़िन्दगी की कश् म् कश् के बीचउत्तर ढूँढ़ती बचपन बचाओ य़ा भूख…
Read More...
Read More...
