“प्रेम प्रसंग में सामाजिक भेदभाव”
यूथ कैंपस:: (नोट यहां प्रस्तुत सभी लेख , लेखक के निजी विचार हैं)
संपादकीय:भारतीय सामाजिक व्यवस्था निहायती गैर-बराबरी किस्म का है चाहे जाति,वर्ग,पंथ,इत्यादी किसी भी आधार पर इनकी संरचना क्यूं न हो परंतु प्यार करने वाले लोग हमेशा ही इनसभी से टकराते रहे है| दरअसल अब तो प्रेम- सप्ताहिक महोत्सव यानि की “वालेंटिन वीक ” का भी प्रचलन है जो की विश्वव भर मे फरवरी के महीने कि दूसरे सप्ताह मे मनाया जाता है |इस आधुनिकता भरी दौर मे भारत जैसे लोकतान्त्रिक प्रणाली मे भी क्या प्रतेक जन की यह हैसियत है की इस किस्म के तहवारों को स्वीकार कर इनकी अनुसंसा कर पाये यदि नही, तो फिर वजह क्या है ?
बात यह है कि हमारे बीच बहूत कम प्रेम- प्रसंग ऐसे है जिनके यात्रा मे कोई सामाजिक कठिनाई नही आई हो |मसलन अन्तर जातिए और अन्तर संबंध प्रेम प्रसंगो मे उतनी ही प्रतारणा होती है जितनी एक भूखा व्यक्ति किसी रेस्तरां मे अच्छा खाना परोसे और खूद सूखा खाए या जैसे किसी कामगार मजदूर द्वारा अपने काम का दाम मांगना|एक मानव की मनोवैज्ञानिक चेतना मे अपने सारीरिक- प्रकृतिक जरूरतों को निर्भीक होकर किसी को अपना मानकर उसके समक्ष रखना तथा उसी लय मे प्रतीक्षित प्रतिक्रिया की उम्मीद लगाना गलत तो नही होता, यह समझते हुए की अगले व्यक्ति को इसके फलस्वरूप कोई असहजता महशूश न हो तथा उनके सहमति या असहमति का सम्मान हो |
किसी भी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति से प्रेम हो जाना साधारण बात है लेकिन उनदोनों व्योतियों मे प्रेम होना कतई असाधारण| अतः इनके बीच जात, विरादरी, एवं परिवारिक लज्जा प्रमुख भूमिका निभाती है, यह गैर बराबरी का आलम इंसान को इंसान तक का दर्ज़ा देने को तैयार नही है|प्रेम करना यौन आकर्षण से बढ़कर सामाजिक आकर्षण के तुल्य हो गया है,इसकेलिए मै अपनी प्रेम प्रसंग के हवाले से निजी अनुभव मे सामाजिक भेदभाव को यहा सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत कर रहा हू|
मेरी उम्र २४ है ठीक इसी उम्र की एक लड़की से मुझे प्रेम होता है| मतलब मै उससे गहरी दोस्ती करना चाहता हू, मेरे अंदर चल रहे अंतर्द्वंद को उससे साझा करना चाहता हू उसकी मदद चाहता हू| मै उससे वासना भी चाहता हू,रोमांटिक आनंद भी, पर यह भी चाहता हू की इनसब क्रियाकलापो मे उसकी भी सहभागिता हो चेतन मन से| मै इंचीजों के लिए अपने मिज़ाज की लड़की को ढूंढ रहा था ताकि उसको प्रेमिका का मान दू| पर हुआ भी कुछ ऐसा ही एक लड़की जो की मेरी विश्वविद्यालया सहपाठी है उसने मुझसे नजदीजिकिया बढ़ानी शुरू कर दिया और मै भी इनमे मगशूल हो गया|कुछ दिनों तक अच्छा अच्छा वक्त साथ बिताने के बाद हमदोनों के साथ साथ हमारे दोस्तों को भी लगने लगा की वाकई हमदोनों मे प्यार हो गया है| हमलोग तब स्नातकोत्तर के विधार्थी है और अलग अलग सामाजिक जाती-वर्ग पृष्ठभूमि से आते है| अब बातों बातों मे अक्सर इस बात पर बहस हो जाती थी की हमारे रिसते आगे कैसे चलेंगे और कब तक चलेंगे,क्यूंकी उसके अनुसार उनके परिवार और समाज की सहमति इस प्रेमलीला पर नही होंगे|और उसने इसी आधार पर संबंध विच्छेद का निर्णय लिया|पाठको के समझदारी मे कई कारण हो सकते है इसके लेकिन हमारे प्रेम लीला का समापन केवल और केवल गैर जातिए पहल है| हालांकि मै उसकी अकादमिक सूझबोझ को दाद देता हू,वह वैज्ञानिक चेतना के पैरोकार भी है लेकिन सामाजिक कुरीतियो की डर दवाव मे बुझदिल होकर निर्णय लेना शिक्षाविद की पहचान नही होती| दो लोगों के बीच की तमाम गलतियों को समय रहते सुधारा जा सकता है लेकिन किसी भी सूरतेहाल मे मौजूदा गैर बराबरी और सामाजिक भेदभाव के हतकंडो को बल प्रदान करना एक सामाजिक विशेषाधिकार लोगों या कायरता की पहचान है,और हमसब न्यायप्रिय,समतामूलकवादी को हर छण इन प्रविर्तियों से लरते रहना है|
यह बताना जरूरी है की जो रूढ़िवादी परिवेश से आते है उनमे से सवर्ण जाती की लड़कियो को सहजाति लड़के ही प्रेमस्वरूप चाहिए ठीक उसी प्रकार गैर सवर्ण प्रेमी उगल को सहजाति| ये रूढ़िवादिता हमे जकरे क्यूँ है,बजाए तमाम प्रगतिशील सैक्षणिक संस्थानों मे प्रगतिशील शिक्षकों से शिक्षौपार्जन के बाबजूद| हमारे तमाम सांस्कृतिक,बौद्धिक क्रांति का उद्देस्य प्रेम फैलाना न होकर, किस आधुनिकता और मानवहितैषी दिशा निर्देशित हो रहा है गंभीरता से सोचने का विषय है| क्या कभी भी “प्रेम की आज़ादी” के बगैर कोई भी सामाजिक क्रांति सफल हो सकती है? अर्थात मेरे निजी अनुभावों को सामान्यीकरण की दृष्टिकोण से देखे बिना अपने अपने प्यार करने की आज़ादी को अपने समाज मे तलासते रहना तथा उसे गढ़ते रहना का गुहार है| मेरे मायने मे मुझसा अधिका-धिक लोग प्रेममई होकर सामाजिक भेदभाव का शिकार हो जाते है|
लव आज़ाद ज़िंदावाद||
लेखक:
विकाश राज
स्वतंत्र शोधार्थी
हाजीपुर,बिहार।

