क्या ‘आप’ के 7 राज्यसभा सांसदों का बीजेपी में विलय कानूनी रूप से वैध होगा?
आम आदमी पार्टी में बड़ी टूट: 7 राज्यसभा सांसद बीजेपी में शामिल, क्या टिक पाएगा ‘विलय’ का दांव?
नई दिल्ली | आम आदमी पार्टी (AAP) को राज्यसभा में एक बड़ा झटका लगा है। पार्टी के 10 में से 7 सांसदों ने पाला बदलते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया है। शुक्रवार, 24 अप्रैल को हुए इस घटनाक्रम ने देश की सियासत और कानूनी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है।
राघव चड्ढा के नेतृत्व में ‘विलय’ का एलान
राज्यसभा में ‘आप’ के पूर्व डिप्टी लीडर राघव चड्ढा ने इस बगावत का नेतृत्व किया। उन्होंने घोषणा की कि वे और उनके साथ 6 अन्य सांसद स्वेच्छा से बीजेपी में अपनी पार्टी का ‘विलय’ कर रहे हैं। इस टूट के बाद अब उच्च सदन में आम आदमी पार्टी के पास केवल 3 सांसद (सभी दिल्ली से) बचे हैं, जबकि पंजाब से आने वाले सभी सांसद अब बीजेपी खेमे में जा चुके हैं।
सभापति की मुहर और सरकार का स्वागत
राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने सोमवार को आधिकारिक रूप से इन सात सांसदों के बीजेपी में विलय को स्वीकार कर लिया। संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने इस फैसले की पुष्टि करते हुए कहा:
“माननीय सभापति ने सात सांसदों के भाजपा में विलय को अनुमति दे दी है। पीएम मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व वाले एनडीए परिवार में इन सदस्यों का स्वागत है।”
संजय सिंह की चुनौती: “अदालत का रास्ता खुला है”
दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी इस विलय को अवैध करार दे रही है। पार्टी सांसद संजय सिंह ने सभापति को याचिका सौंपकर इन सांसदों को ’10वीं अनुसूची’ (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत अयोग्य घोषित करने की मांग की है।
संजय सिंह का आरोप है कि सभापति ने ‘आप’ के पक्ष को सुने बिना ही फैसला सुना दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि सांसदों की सदस्यता रद्द नहीं की गई, तो पार्टी न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाएगी।
कानूनी विश्लेषण: क्या कहती है संविधान की 10वीं अनुसूची?
इस पूरे विवाद के केंद्र में ‘दल-बदल विरोधी कानून’ है, जिसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए जोड़ा गया था। इसके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
दो-तिहाई का नियम: कानून के मुताबिक, यदि किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) निर्वाचित सदस्य एक साथ किसी दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं, तो उसे ‘विलय’ माना जाता है और उनकी सदस्यता नहीं जाती।
आम आदमी पार्टी का गणित: राज्यसभा में ‘आप’ के कुल 10 सदस्य थे। 7 सांसदों का जाना दो-तिहाई के आंकड़े (6.66) से अधिक है, जो तकनीकी रूप से विलय के पक्ष में दिखता है।
2003 का संशोधन: 91वें संविधान संशोधन (2003) के बाद ‘पार्टी में टूट’ (1/3 सदस्यों का अलग होना) के प्रावधान को खत्म कर दिया गया था। अब केवल ‘विलय’ ही सदस्यता बचाने का एकमात्र कानूनी रास्ता है।
पेच कहाँ फँसा है?
आम आदमी पार्टी का तर्क है कि ‘विधायी दल’ (Legislative Party) का बहुमत होने मात्र से ‘मूल सांगठनिक पार्टी’ (Original Political Party) का विलय नहीं माना जा सकता। यदि मामला कोर्ट पहुँचता है, तो सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों (जैसे महाराष्ट्र का शिवसेना/NCP विवाद) की रोशनी में इसकी व्याख्या होगी कि क्या इन सांसदों ने स्वेच्छा से पार्टी छोड़ी है या यह एक वैध विलय है।
फिलहाल, रिकॉर्ड के अनुसार आम आदमी पार्टी के 7 सांसद अब बीजेपी के सदस्य बन चुके हैं, लेकिन कानूनी लड़ाई अभी लंबी खिंचने के आसार हैं।
