गौ-माता का दर्जा और नीतिगत विरोधाभास: एक आत्म-मंथन।

भारत में गाय के इर्द-गिर्द चल रही बहस अब जीव विज्ञान और कृषि से कहीं आगे निकलकर सामाजिक-राजनीतिक पहचान और ध्रुवीकरण का केंद्र बन चुकी है। एक बुनियादी सवाल जो देश के विवेक को झकझोरता है, वह यह है कि क्या गाय एक ‘पशु’ है या एक ‘माता’? यदि इसे ‘माता’ का दर्जा दिया गया है, तो इसके संरक्षण के लिए एक समान और सख्त कानून होना चाहिए। लेकिन यदि यह मात्र एक पशु है, तो इसे लेकर चलने वाला भावनात्मक और अक्सर बहिष्करण (exclusionary) करने वाला राजनीतिक नैरेटिव अपनी नैतिक आधारशिला खो देता है।
“वर्तमान स्थिति में सबसे बड़ा विरोधाभास ‘निर्यात बनाम घरेलू नीति’ का है। एक ओर जहाँ गौ-मांस के घरेलू उपभोग को लेकर सख्त कानून और आपराधिक कार्रवाई की जाती है, वहीं दूसरी ओर भारत दुनिया के शीर्ष बीफ निर्यातक देशों में शुमार है। यह स्पष्ट करता है कि गाय की पवित्रता का मुद्दा अक्सर ‘आस्था’ से अधिक ‘सुविधा’ और ‘राजनीतिक एजेंडे’ का विषय बन गया है। जब वही तंत्र, जो गाय की दिव्यता का प्रचार करता है, विदेशी मुद्रा के लिए इसके मांस का निर्यात करता है, तो उस श्रद्धा की ईमानदारी पर सवाल उठना लाजिमी है। यह ध्रुवीकरण की उस राजनीति का हिस्सा है, जहाँ सांस्कृतिक भावनाओं को वोट बैंक के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जबकि वाणिज्यिक हित निर्बाध चलते रहते हैं।”
शायद इस दिखावटी श्रद्धा का सबसे दुखद पहलू हमारा सामाजिक यथार्थ है। हम ऐसे समाज में रह रहे हैं जहाँ ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण कानून’ की आवश्यकता पड़ती है और अदालतों में हजारों बुजुर्ग माता-पिता अपने ही बच्चों द्वारा त्यागे जाने का दर्द झेल रहे हैं। विडंबना यह है कि जो लोग ‘गौ-माता’ के संरक्षण का दावा करते हैं, वे अक्सर उस जन्मदात्री माँ का सम्मान करने में विफल रहते हैं जिसने उन्हें जीवन दिया है। निस्संदेह, जो व्यक्ति अपनी असली माँ की पवित्रता को नहीं समझ सकता, वह ‘गौ-माता’ के प्रति श्रद्धा के वास्तविक अर्थ को कैसे समझ सकता है?
सच्ची श्रद्धा चयनात्मक या अवसरवादी नहीं हो सकती। यदि हमें मातृत्व का सम्मान करना है, तो इसकी शुरुआत मानव जीवन की गरिमा से होनी चाहिए और यह हमारे कानूनों व आचरण में भी झलकनी चाहिए। इस निरंतरता के अभाव में, यह केवल एक राजनीतिक रणनीति है, जो न केवल गौ-प्रेमियों की आस्था का अपमान है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के प्रति भी एक गंभीर नैतिक विफलता है।
(लेखक दिल्ली हाईकोर्ट में सीनियर एडवोकेट हैं)
