Taj Mahal में बरगद की दास्‍तां भी कम रोचक नहीं, नए बरगद ने दी पुराने को संजीवनी

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 दुनिया भर में ताजमहल को उसके अद्भुत सौंदर्य और शहंशाह शाहजहां व मुमताज की मोहब्बत के लिए जाना जाता है। यहां लगे बरगद के पेड़ (वट वृक्ष) की दास्तां भी कम रोचक नहीं है। दो दशक से पूर्व तेज रफ्तार से आई आंधी में पेड़ टूटकर गिर गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) की उद्यान शाखा के प्रयासों और नए लगाए गए बरगद के पेड़ से मिली संजीवनी से ब्रिटिश काल का बरगद आज भी सैलानियों को छांव और पक्षियों को अासरा दे रहा है।

वट अमावस्या 10 जून को है। शहर में कई जगह बरगद के पेड़ लगे हुए हैं। ताजमहल में भी दो जगह बरगद के के पेड़ लगे हुए हैं। एक फोरकोर्ट में लगा हुआ है और दूसरा नक्कारखाने के पास है। यह दोनों पेड़ ब्रिटिश काल के हैं। एएसआइ से निदेशक उद्यान के पद से सेवानिवृत्त हुए डा. हरबीर सिंह बताते हैं कि ताजमहल में लगे बरगद के दोनों पेड़ ब्रिटिश काल के और 100 वर्ष से अधिक पुराने हैं। फोरकोर्ट में लगा हुअा बरगद का पेड़ दो दशक से पूर्व आई आंधी में टूट गया था। उद्यान शाखा ने प्राचीन पेड़ को क्रेन की सहायता से उठाकर दोबारा गड्ढा खोदकर लगाया था। उसे गिरने से रोकने को लोहे का फ्रेम लगाया गया था। पुराने पेड़ की दक्षिण दिशा में एक नया बरगद का पेड़ रोपा गया था, जिससे कि उसे सहारा मिल सके। नए पेड़ ने पुराने पेड़ को संजीवनी दी और उसकी जड़ों ने उसे जकड़ लिया। ब्रिटिश काल का बरगद आज भी ताजमहल देखने आने वाले पर्यटकों को छांव और पक्षियों को आसरा दे रहा है। ताजमहल में काम करने वाले फोटोग्राफर भी पर्यटक नहीं होने पर पेड़ की छांव में आराम करते हैं।

लार्ड कर्जन के समय हुआ उद्यान में परिवर्तन

एप्रूव्ड टूरिस्ट गाइड एसोसिएशन के अध्यक्ष शमसुद्दीन खान बताते हैं कि भारत में वायसराय लार्ड कर्जन का कार्यकाल वर्ष 1899-1905 तक रहा था। कर्जन के समय स्मारकों के संरक्षण व देखरेख पर काफी ध्यान दिया गया था। ताजमहल के उद्यान में लगे विशाल पेड़ों को काटकर उनकी जगह साइप्रस व अन्य प्रजातियों के पेड़ लगाए गए थे। चारबाग पद्धति पर बने मूल उद्यान को बदलकर ब्रिटिश पद्धति के उद्यान में बदल दिया गया था।

 

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