खालिद आज़मी ग़ज़ल प्रस्तुति
आज़ादी का काग़ज़
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दुश्वारी के दिन जायेंगे
नया सवेरा उतरेगा
सबकी आज़ादी का काग़ज़
लेकर सूरज उभरेगा
दबे हुए मजबूर मुलाज़िम
बाहर घर से निकलेंगे
हाथ में अपने हक़ का परचम
लेके सड़क पे उतारेंगे
सावधान! सरमायादारों
हो के रहेगा बँटवारा
मेहनतकश अब मालिक होंगे
ख़त्म हुआ अब खेल तुम्हारा
जाग गये हैं नींद से अपनी
सदियों से जो सोये थे
अभी अभी बेदार हुए हैं
ख़्वाबों में जो खोये थे
कामगार मज़लूम गदागर
अफ़सर होंगे नाज़िम होंगे
बेक़सूर जो ज़ुल्म सह चुके
मालिक होंगे हाकिम होंगे
— ख़ालिद आज़मी
