*स्त्री रोगों में आयुर्वेदिक चिकित्सा अत्याधिक लाभदायक*

डॉo सुनील टंडन: असिस्टेंट प्रोफेसर(छत्तीसगढ़ आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल मनकी)

हैल्थ डेस्क:हमारे समाज में महिला अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक एक अहम किरदार निभाती है ।अपने सभी भूमिकाओं में निपुणता दर्शाते हुए व समाज को अपने मजबूत कंधों में संभाले रखती है।स्वस्थ समाज के लिए महिलाओं का स्वस्थ होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्त्रियों को रजोदर्शन(menarche) से लेकर रजोनिवृत्ति (manopause)के बीच के प्रजनन काल में अनेकों रोगों से जूझना पड़ता है ।आयुर्वेद विश्व की सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धति है और इसका चिकित्सा में अधिकार क्षेत्र अत्यंत वृहत है ।आयुर्वेद के 8 अंगों में “प्रसूति तंत्र एवं स्त्री रोग”भी है। आयुर्वेद में इन रोगों के निवारण के लिए बताए गए चिकित्सा सिद्धांत और आयुर्वेदिक औषधियां मानव समाज के लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है।

*स्त्री रोग विज्ञान*

स्त्री शरीर में पुरुष की अपेक्षा विशेष रचनात्मक और क्रियात्मक स्थिति पाई जाती है ।इससे संबंधित रोग ही स्त्री रोग कहलाते हैं और संबंधित समूचे शास्त्र को “स्त्री रोग विज्ञान” कहते हैं ।
*प्रमुख स्त्री रोग*:-

*मासिक धर्म से संबंधित विकार(Disorder of Mestruation)*

1.अनार्तव( मासिक धर्म अथवा आर्तव स्राव का अभाव अथवा उसका रुक जाना।आधुनिक विज्ञान में इसे आमीनॉरिया कहते है ।स्त्रियों में प्रतिमाह मासिक धर्म का आर्तव स्राव का ना होना अथवा एक बार होकर बंद हो जाना अनार्तव कहलाता है ।
2. कष्टआर्तव :- कष्ट पूर्वक आर्तव स्राव या कष्ट के साथ मासिक धर्म का होना।विभिन्न स्त्रियों में उनके सहनशक्ति के अनुसार आर्तव स्राव के समय दर्द का अधिक या कम महसूस करना पाया जाता है ।अतः कष्टआर्तव कोई रोक ना होकर एक लक्षण मात्र है।
3. अल्पर्ताव:- जब आर्तव चक्र 28 दिन का ही होता है परंतु रक्त की मात्रा और आर्तव काल बहुत कम होता है ,एक या 2 दिन का ही होता है ऐसी दशा को अल्पर्ताव वाला मासिक धर्म (स्कैंटी मेंस्ट्रुएशन )भी कहते हैं ।
4. अत्यार्तव:- मासिक धर्म के समय अत्यधिक रक्तस्राव होना। सामान्य रक्तस्राव की मात्रा 30-80ml होती है। अगर रक्तस्राव 80-100 ml से अधिक हो और अधिक दिनों तक रहे तब उस स्थिति को अत्यार्तव (menorrhagea) कहते है।

6. प्रदर रोग या असृगदर :- ऋतुकाल में या अऋतुकाल में अत्याधिक मात्रा में रक्त स्राव या दो ऋतु चक्रों के अंतराल में अल्प मात्रा में होने वाला रक्तस्राव प्रदर रोग (मेट्रो रेजिया )रोग कहलाता है ।
7. श्वेत प्रदर:- इस विकार में अत्याधिक सफेद स्राव होता है। आधुनिक विज्ञान में इसे ल्यूकोरिया कहते हैं। यह विकार कफ दोष के वृद्धि से होता है ।
8. योनि शोथ( वेजिनईटिस):-योनि के व्रण शोथ को योनि शोथ कहते हैं। इस प्रकार योनि की अंतर कला के उत्तको में उत्पन्न संक्रमण, सूजन एवं जलन होता है ।
9. योनि और गर्भाशय संबंधित रोग:- विभिन्न प्रकार के योनि रोग भग कण्डू , भग शोथ(वल्वाइटिस) गर्भाशय ग्रीवा शोध( सर्विसाइटिस) गर्भाशय संक्रमण इत्यादि।
10. स्तन वृद्धि (Breast abcess)जब एक सीमित स्थान में संक्रमण आदि से दूषित धीरे-धीरे गंभीर मूल पीड़ा युक्त गोल बड़े आकार के शोध या सूजन युक्त स्थान में उत्पन्न होकर अपना स्थान ले लेती है।
11. बन्ध्त्व(Infertility):-अनेक रोग एवं कारक ऐसे हैं जो स्त्री-पुरुष दोनों की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करते हैं और उनमें बन्धत्य या बांझपन उत्पन्न करते हैं । 12.पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम और डिजीज (PCOS/PCOD):- (पॉली सिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम/ डिसीज़) प्रजनन उम्र की महिलाओं में संभवतः सबसे तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्या है। यह विकार लम्बे समय तक अनार्तव की समस्या और अंडाशय में बहुत सारी सिस्ट या ग्रंथि बन जाने पर होता है। आयुर्वेद में स्त्री रोगों के लिए वर्णित रसोषधि और काष्ठ औषधि के द्वारा यह विकार शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।

*स्त्री रोगों में आयुर्वेदिक चिकित्सा सिद्धांत* :-
वर्त्तमान समय मे दृष्टिगोचर समस्त स्त्री रोगों का उपचार आयुर्वेद में नैसर्गिक रूप से बिना किसी हानि के संभव है। आयुर्वेद के अनुसार स्त्री रोग में वर्णित आयुर्वेदिक औषधि के साथ-साथ वर्णित आहार-विहार और योग को पालन कर शरीर में हार्मोन की असमानता को दूर कर और शरीर के प्रजनन अंगों को सामान्य रखते हुए स्वस्थ और सामान्य जीवन व्यतीत करने में आयुर्वेद लाभकर होता है।

*कुछ प्रमुख चिकित्सा उपचार*:-
1. पिचु:- अपितु विभिन्न प्रकार के आयुर्वेदिक औषधि से सिद्ध कल्क या क्वाथ का योनि में पिचु धारण करने से निसंदेह रोग नष्ट होते हैं।
2. बस्ति :- स्नेह द्रव्य /कल्क/क्वाथ का गुद मार्ग से देना ।
3. उत्तर बस्ति:- औषधि को मूत्र मार्ग से देना। मूत्राशय में संक्रमण में अत्यंत लाभ कारक होता है।
4.वर्ति:- विभिन्न औषधि की वर्ति बनाकर योनि शोधनार्थ धारण करना।
5. लेप :-विभिन्न औषधि को पीसकर योनि आदि में लेप करने से शोथ और प्रदाह में अत्यंत लाभ होता है।
6. क्वाथ, कल्क, और चूर्ण का प्रयोग ।
7. परिषेक:- औषधि से साधित घृत /तैल अथवा कल्क को परिषेक करने से संक्रमण नष्ट होता है ।
8. पंचकर्म :-वमन विरेचन आदि चिकित्सा द्वारा शरीर के विषाक्त पदार्थों को निकाल कर शरीर को शुद्ध करती है ।

*कुछ प्रमुख एकल औषधि द्रव्य:-* शतावरी ,अश्वगंधा, हरिद्रा कुटज , कटुकि , लोध्र,चंदन, मधुक , कुश, मुस्त, रास्ना, करंज, निम्ब आदि।

*स्त्री रोग में कुछ महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक योग* :-
पुष्यानुग चूर्ण
बृहत शतावरी घृत
फल घृत
नियोगराधि क्वाथ
महारास्नादि क्वाथ
शतावरी चूर्ण व तैल
चंद्रप्रभा वटी
योगराज गुग्गुल
पुंगपाक
खंड कुष्मांड अवलेह
शीत कल्याणक घृत
बोल पर्पटी
गोक्षुरादि गुग्गुल
वंगेश्वर रस
नारायण तैल
लहसुन तैल
चोपचिनियादी तैल

नोट:- आयुर्वेदिक औषधि का प्रयोग आयुर्वेद चिकित्सक के देख रेख में लेना उचित है।