“इस दौर के युवा नायक”
युवा की कलम से✍️:
आखिर मैं कबतक जिंदा रख पाऊंगा भगत को कहानियों उपन्यासों के किताबों में ,मैं उस भगत की बात नही कर रहा जो एक विशेष वर्ग है , मैं उस भगत की बात कर रहा हूं जो हर वर्ग के लिए विशेष है ।
ये दौर एकिश्वी सदी के दूसरे दशक का है पर इसका स्वरूप आज भी सैंकड़ों साल पुराना है ।
विकास का केवल एक मार्ग ऊंची इमारतें लंबी गाड़ियों और पत्थर से ढकती मिट्टी ने ले लिया है , जहां इंसान कोल्हू के बैल की तरह तेल निकाल रहा है ।
विकास में नही दिख रहा तो गैरबराबरी , ऊंच – नीच का फर्क , जाति में बंधते कल के नायक जो आज की हमारी आजादी के लिए लड़े और विचारों का संहार किए ।
और वो भगत जो मिट्टी में बंदूक रोपा करता था ताकि हम इस आजाद जमीं पर फसल उपजा सके वो खुद कई बंधनों में बंध गया ,किसी ने उसके माथे पर टोपी पहनाई तो किसी ने उसके माथे पर पगड़ी बांध दिए ।
जिस भगत सिंह का शरीर फांसी से जकड़ गया हमें आज़ादी दिलाने के लिए उसी देश के नागरिकों का तन आज़ाद है और मानसिक गुलामी हमें आज भी बुरी तरह जकड़े हुए है ।
” ये सत्ता का हस्तांतरण है ” ये विचार आज भी जीवित है पर इसको समझने के लिए हम पर्याप्त नही है।
हम केवल इसको किताबों में पढ़ के सोशल साइट्स पर डाल कर खुश हैं ।
पर कष्ट नही उठा सकते सवाल नही कर सकते ।
” हम सब चाहते हैं भगत सिंह पैदा हो पर अपने नही पड़ोसी के घर से ” ।
मैं आज इस लेख को लिख रहा हूं और आप इसको पढ़ेंगे , साल में एक दिन उनकी जयंती पर आप याद करेंगे और फिर भूल जाएंगे इस देश के उस युवा को जिसका विचार , त्याग हर दौर में युवा होगी ।
पर सब करेंगे पढ़ेंगे पर हम नही करेंगे तो सत्ता से सवाल , हम अपने नायकों को केवल जिंदा रखने की कोशिश करेंगे किताबों में हकीकत में हम रहेंगे उनके विचारों से कोसो दूर हैं ।

