राष्ट्रधर्म सर्वोपरि: बकरीद पर गोकशी नहीं, गोदान का संकल्प

आइए, इस बकरीद पर हम संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठें और पूरी दुनिया को संदेश दें कि तमाम पहचानों से पहले हम एक हैं— सबसे पहले सच्चे हिंदुस्तानी हैं। गोकशी से परहेज और गोदान का संकल्प ही सच्ची राष्ट्रीय इबादत है।

असरा अख्तर, केन्द्रीय कार्यालय, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच

भारत वर्ष कोई नक्शे पर खींची गई लकीरों से बंधा भू-भाग नहीं, बल्कि करोड़ों अंत:करणों को एक सूत्र में पिरोने वाली जीवंत सांस्कृतिक अस्मिता है। जिस आर्यावर्त की सनातन परंपरा में ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ कहकर नारी को देवी का दर्जा दिया गया, वहाँ समस्त चराचर का पालन करने वाली गाय को ‘गौ माता’ का सर्वोच्च स्थान मिलना स्वाभाविक है। इसी भाव को लेकर आगामी पावन पर्व ईद-उल-अज़हा पर मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने देशव्यापी आह्वान किया है: “बकरीद पर गोकशी नहीं, बल्कि गोदान का संकल्प लें।” यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि बहुसंख्यक समाज की आस्थाओं के प्रति आदर और सदियों पुरानी साझी विरासत को मजबूत करने का युगांतरकारी कदम है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ कार्यकारिणी सदस्य और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्शक आदरणीय इंद्रेश कुमार जी का *विचार* स्पष्ट है— *मिट्टी एक, पूर्वज एक*। हमारा मानना है कि हमारी पूजा पद्धति, मजहब या इबादत के तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारे पूर्वज, हमारी संस्कृति और हमारी मातृभूमि एक ही है। ‘हम सब बाद में, सबसे पहले हिंदुस्तानी’— यही वह समरसता की अलख है जो हर नागरिक को जोड़ती है। राष्ट्रहित और सामाजिक समरसता के सामने हर पहचान गौण है। एक सच्चे हिंदुस्तानी का कर्तव्य है कि वह अपने पड़ोसी की भावनाओं का आदर करे। जिस गौ माता को करोड़ों लोग आस्था, श्रद्धा और आजीविका का आधार मानते हैं, उसकी हत्या किसी भी पवित्र इबादत का हिस्सा नहीं हो सकती।

यह विचार केवल मंच तक सीमित नहीं रहा। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक जमीनी स्तर पर वैचारिक क्रांति का शंखनाद किया। कर्मठ कार्यकर्ताओं ने जनजागरण यात्राएं, सद्भावना संगोष्ठियां और संकल्प सभाएं कर मुस्लिम समाज को इस पावन कर्तव्य से जोड़ा। इस अभियान को घर-घर तक पहुँचाने के लिए समरसता के मंत्र गूँजे: *”गोकशी से परहेज, गोदान से बढ़ेगा स्नेह और सहेज”*— इसके जरिए परिवारों को गौशालाओं में दान के लिए प्रेरित किया गया। *”पूजा पद्धति अपनी-अपनी, राष्ट्रभक्ति सबकी एक”*— इस मूलमंत्र ने याद दिलाया कि मजहब बदलने से पूर्वज और मातृभूमि के प्रति जिम्मेदारी नहीं बदलती। *”गाय की रक्षा, देश की सुरक्षा”*— हर जिले में बने ‘गौ रक्षा प्रकोष्ठ’ के माध्यम से मुस्लिम युवाओं ने अवैध तस्करी रोकने और बीमार गायों की सेवा का बीड़ा उठाया। *”गो-घृत से महके आंगन, दूर हो नफरत का क्रंदन”*— त्योहारों पर गाय के घी-दूध से बने उत्पादों को अपनाकर गौ-वंश की आर्थिक और आत्मिक महत्ता को फिर से स्थापित किया गया।

वैज्ञानिक दृष्टि से भी गाय का महत्व असंदिग्ध है। गौ-दूध, घी और पंचगव्य न केवल मानव स्वास्थ्य के लिए अमृत हैं, बल्कि कृषि भूमि की उर्वरा शक्ति को भी अक्षुण्ण रखते हैं। इस्लाम में भी कुर्बानी का वास्तविक अर्थ अपनी सबसे प्रिय वस्तु का त्याग कर समाज में अमन-चैन कायम करना है। किसी की आस्था को ठेस पहुँचाकर की गई इबादत कभी कबूल नहीं होती।

आइए, इस बकरीद पर हम संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठें और पूरी दुनिया को संदेश दें कि तमाम पहचानों से पहले हम एक हैं— सबसे पहले सच्चे हिंदुस्तानी हैं। गोकशी से परहेज और गोदान का संकल्प ही सच्ची राष्ट्रीय इबादत है।