पुष्कर बनाम सबरीमला: ब्रह्मा मंदिर और सबरीमला की अलग-अलग परंपराओं पर सुप्रीम कोर्ट में बहस
"सबरीमला विवाद: सुप्रीम कोर्ट में तीसरे दिन की सुनवाई; SG तुषार मेहता ने अन्य मंदिरों की विशिष्ट परंपराओं का दिया हवाला" केंद्र की ओर से दलील पेश करते हुए सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि देश के अलग-अलग मंदिरों में अपनी-अपनी मान्यताओं के आधार पर प्रवेश के नियम तय हैं।

सबरीमला विवाद: “परंपराएं लैंगिक भेदभाव नहीं, आस्था का हिस्सा,” सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने दी अन्य मंदिरों की मिसाल
नई दिल्ली: सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के तीसरे दिन केंद्र सरकार ने अपना पक्ष मजबूती से रखा। सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने दलील दी कि मंदिर की परंपराओं को ‘लैंगिक भेदभाव’ के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि ये सदियों पुराने धार्मिक रीति-रिवाजों और आस्था का अभिन्न हिस्सा हैं।
“आर्टिकल 14 की कसौटी पर सीधे नहीं परखा जा सकता धर्म”
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिलने वाले धार्मिक अधिकारों को अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के साथ संतुलित करने की आवश्यकता है। उन्होंने जोर देकर कहा:
हिंदू धर्म दुनिया का इकलौता धर्म है जहाँ महिलाओं को न केवल बराबर माना गया, बल्कि उन्हें पुरुषों से ऊँचा दर्जा दिया गया है।
कई ऐसे मंदिर और अनुष्ठान हैं जहाँ पुरुष, देवियों के भक्त बनकर उनके पैर छूते हैं।
ये प्रथाएं अदालती न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से बाहर होनी चाहिए क्योंकि ये विश्वास का विषय हैं।
देश के अन्य मंदिरों की परंपराओं का दिया हवाला
केंद्र ने अपनी दलील को पुख्ता करने के लिए देश के उन मंदिरों की सूची पेश की जहाँ पुरुषों के प्रवेश पर पाबंदी है या जहाँ महिलाओं को विशेष अधिकार प्राप्त हैं:
ब्रह्मा मंदिर (पुष्कर, राजस्थान): दुनिया के इस एकमात्र ब्रह्मा मंदिर में शादीशुदा पुरुषों के प्रवेश पर रोक है।
कन्याकुमारी भगवती मंदिर: यहाँ देवी के ‘सन्यास’ रूप की पूजा होती है, इसलिए विवाहित पुरुषों का मंदिर के भीतर जाना वर्जित है।
अट्टुकल भगवती मंदिर (केरल): यहाँ पोंगल उत्सव में केवल महिलाएँ शामिल होती हैं। यह आयोजन दुनिया का सबसे बड़ा महिला जमावड़ा होने के कारण गिनीज बुक में दर्ज है।
चक्कुलाथुकावु मंदिर (केरल): यहाँ ‘नारी पूजा’ के दौरान पुरुष पुजारी महिला भक्तों के पैर धोते हैं और उस दिन केवल महिलाओं को प्रवेश मिलता है।
कोट्टनकुलंगरा श्री देवी मंदिर (केरल): यहाँ सदियों पुरानी परंपरा है कि पुरुष महिलाओं के कपड़े पहनकर (साड़ी पहनकर) पूजा करते हैं।
माता मंदिर (मुजफ्फरपुर, बिहार): एक विशेष अवधि के दौरान इस मंदिर में पुरुष पुजारी तक का प्रवेश वर्जित होता है।
संवैधानिक प्रश्न: क्या बाहरी व्यक्ति परंपरा को चुनौती दे सकता है?
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की पीठ के सामने एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उभरा— “क्या ऐसा व्यक्ति जो उस विशेष धार्मिक समूह का हिस्सा नहीं है, उसकी परंपराओं को चुनौती दे सकता है?”
एसजी तुषार मेहता ने जस्टिस इंदु मल्होत्रा के 2018 के असहमति वाले फैसले का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं के अधिकारों का सीधा उल्लंघन नहीं हुआ था।
पीठ की टिप्पणी: कोर्ट ने कहा कि यदि कोई गंभीर संवैधानिक प्रश्न उठता है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। यदि याचिका दाखिल करने के अधिकार (Locus Standi) का ही मुद्दा होता, तो यह 2006 में ही खारिज हो जाना चाहिए था।
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि यदि कोर्ट इस मामले के कानूनी पहलुओं पर फैसला करता है, तो अन्य संवैधानिक प्रश्नों पर भी विस्तार से सुनवाई होनी चाहिए।
