पश्चिम बंगाल: वोटर लिस्ट से 91 लाख नाम हटने का क्या है पूरा सच?
मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SSR) के बाद बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने पर राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू।
पश्चिम बंगाल: चुनाव से ठीक पहले वोटर लिस्ट में बड़ी कटौती; 91 लाख नाम हटाए गए
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के मुहाने पर मतदाता सूची को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। चुनाव आयोग द्वारा किए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (SIR) के बाद राज्य की वोटर लिस्ट से करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। यह संख्या राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 12 प्रतिशत है।

आंकड़ों का गणित: कैसे घटी वोटरों की संख्या?
अक्टूबर में जब SIR प्रक्रिया शुरू हुई थी, तब राज्य में कुल 7.66 करोड़ मतदाता थे। चुनाव आयोग की कार्रवाई को निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है:
63 लाख नाम (फरवरी में): इन्हें मृत, डुप्लीकेट या अनुपस्थित बताकर सूची से बाहर किया गया।
60 लाख वोटर ‘जांच के दायरे’ में: इनके रिकॉर्ड में नाम की स्पेलिंग, लिंग या उम्र के अंतर जैसी “तार्किक विसंगतियां” पाई गईं।
27 लाख ‘अयोग्य’ (हालिया कार्रवाई): सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 700 न्यायिक अधिकारियों ने जांच की और सोमवार को इनमें से 27 लाख लोगों को वोट देने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया।
विवाद के केंद्र में पश्चिम बंगाल ही क्यों?
हालांकि SIR की प्रक्रिया बिहार समेत 9 राज्यों में हुई, लेकिन बंगाल में इसने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है।
बीजेपी का पक्ष: पार्टी का दावा है कि यह प्रक्रिया “घुसपैठियों” (बांग्लादेश और म्यांमार से आए) के नाम हटाने के लिए अनिवार्य थी।
टीएमसी का आरोप: सत्तारूढ़ दल का कहना है कि यह उनके मुस्लिम वोट बैंक को निशाना बनाने की एक सोची-समझी साजिश है।
विशेषज्ञों की राय: राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव के अनुसार, बंगाल में SIR की प्रक्रिया बाकी देश से अलग रही क्योंकि यहाँ “तार्किक विसंगतियों” के आधार पर बड़ी छंटनी की गई, जो शुरुआती नियमों में नहीं थी।
मुस्लिम बहुल इलाकों पर सबसे ज्यादा असर
‘सबर इंस्टीट्यूट’ के विश्लेषण के मुताबिक, मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में नाम हटाए जाने की दर सबसे अधिक है। अकेले मुर्शिदाबाद ‘अयोग्य’ घोषित किए गए वोटरों की सूची में शीर्ष पर है।
अदालत और ‘भरोसे की कमी’
मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, तो मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र और राज्य सरकार के बीच “भरोसे की कमी” पर चिंता जताई। यही कारण था कि सत्यापन की जिम्मेदारी प्रशासनिक अधिकारियों के बजाय न्यायिक अधिकारियों (Judicial Officers) को सौंपी गई।
केस स्टडी: “स्पेलिंग की गलती और बरसों का इंतज़ार” आलिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सैफुल्ला बताते हैं कि 2002 की लिस्ट में स्पेलिंग की एक पुरानी गलती के कारण उन्हें और उनके परिवार को ‘अयोग्य’ कर दिया गया, जबकि वे वर्षों से वोट दे रहे थे।
क्या अब ये लोग वोट दे पाएंगे?
91 लाख प्रभावित लोगों के लिए इस चुनाव में वोट देने के रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं:
वोटर लिस्ट फ्रीज: आयोग ने 152 सीटों के लिए लिस्ट फ्रीज कर दी है, बाकी सीटों के लिए भी प्रक्रिया 9 अप्रैल तक पूरी हो जाएगी।
ट्रिब्यूनल की देरी: अपील के लिए 19 ट्रिब्यूनल मार्च के अंत में बनाए गए, जो चुनाव के बेहद करीब है।
पंजीकरण की तिथि: नए वोटर के रूप में जुड़ने की आखिरी तारीख (31 मार्च) भी निकल चुकी है।
निष्कर्ष: चुनाव आयोग इसे ‘वोटर लिस्ट का शुद्धिकरण’ कह रहा है, वहीं आलोचकों का तर्क है कि इस प्रक्रिया ने गरीब और कमजोर वर्गों के संवैधानिक अधिकार को संकट में डाल दिया है। अब यह देखना होगा कि इन ‘डिलीटेड वोटर्स’ का गुस्सा चुनाव के नतीजों पर क्या असर डालता है।
