“अवैध है तो गिराओ, चाहे स्कूल हो या अस्पताल”: मेरठ मामले में सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

जस्टिस जे. बी. पारदीवाला ने इसे एक 'आई ओपनर' (आंखें खोलने वाला मामला) बताते हुए कहा कि यह केवल उत्तर प्रदेश नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक सबक है। यदि राज्य सरकारें समय रहते अपनी जिम्मेदारी निभाएं, तो ऐसी समस्याओं की नौबत ही न आए।

“कानून का शासन जनता की मांग के आगे नहीं झुक सकता”: मेरठ अवैध निर्माण मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त फटकार

नई दिल्ली/मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ में बड़े पैमाने पर हुए अवैध निर्माणों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक और कड़ा रुख अपनाया है। गुरुवार (6 अप्रैल 2026) को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने प्रशासन को फटकार लगाते हुए स्पष्ट किया कि अवैध इमारतों में चल रहे स्कूल और अस्पतालों के नाम पर कानून से समझौता नहीं किया जाएगा।

859 संपत्तियों को नोटिस, 2 महीने में सेटबैक ध्वस्त करने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ की ‘शास्त्री नगर योजना’ क्षेत्र की 859 संपत्तियों में अनिवार्य खुले स्थान (सेटबैक) पर किए गए अवैध कब्जों को दो महीने के भीतर ध्वस्त करने का आदेश दिया है।

ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया:

  • सभी कब्जाधारियों को नोटिस जारी कर 10-15 दिन का समय दिया जाएगा।

  • यदि कब्जाधारी स्वयं अवैध हिस्सा नहीं हटाते, तो प्राधिकरण इसे ध्वस्त करेगा।

  • ध्वस्तीकरण का खर्च भी कब्जाधारियों से ही वसूला जाएगा।

व्यापार से कीमती है बच्चों और मरीजों की जान

कोर्ट ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि 44 ऐसी अवैध संपत्तियां हैं जिनमें 6 स्कूल, 6 अस्पताल, 4 बैंक्वेट हॉल और 3 राष्ट्रीयकृत बैंक संचालित हो रहे हैं। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा:

“हमें आपके व्यवसाय की चिंता नहीं है, हमारे लिए बच्चों और मरीजों की जान महत्वपूर्ण है। आप लोगों की जान खतरे में डालकर व्यापार कर रहे हैं।”

जस्टिस पारदीवाला ने सवाल उठाया कि बिना अनुमति और लाइसेंस के इन अवैध भवनों में स्कूल और अस्पताल चलाने की अनुमति जिला शिक्षा अधिकारी और प्रशासन ने कैसे दी?

यूपी प्रशासन और पूर्व आयुक्त को फटकार

अदालत ने उत्तर प्रदेश प्रशासन और पूर्व मेरठ संभागीय आयुक्त के रवैये पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों ने “पूरी तरह अवैध” इमारतों में सरकारी बैंकों और शिक्षण संस्थानों को चलने दिया, जो प्रशासन की विफलता को दर्शाता है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि सेटबैक (Setback) का कोई ‘कम्पाउंडिंग’ (शमन) संभव नहीं है, यानी जुर्माना भरकर अवैध निर्माण को वैध नहीं किया जा सकता।

पूरे देश के लिए ‘आई ओपनर’ (चेतावनी)

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित न मानकर पूरे देश की राज्य मशीनरी के लिए एक चेतावनी बताया। पीठ ने कहा:

  • आई ओपनर: यह मामला पूरे देश के लिए आंखें खोलने वाला है।

  • समय पर कार्रवाई: यदि सरकारी मशीनरी और अधिकारी समय रहते अपना काम सही दिशा में करें, तो ऐसी नौबत कभी नहीं आएगी।

  • साक्ष्य की मांग: कोर्ट ने 44 प्रमुख संपत्तियों की स्थिति पर हलफनामा मांगा है, जिसमें सील करने से पहले और बाद की स्पष्ट तस्वीरें (Before & After) होनी चाहिए।

अगली सुनवाई जुलाई 2026 में

यह मामला मेरठ के शास्त्री नगर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अवैध निर्माणों की जांच से जुड़ी एक अवमानना याचिका से संबंधित है। कोर्ट ने कानून के शासन को सर्वोपरि बताते हुए कहा कि इसे किसी भी दबाव में नहीं झुकाया जा सकता। मामले की अगली सुनवाई जुलाई 2026 में तय की गई है।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले 25 मार्च 2026 को भी अदालत ने आवासीय क्षेत्रों के वाणिज्यिक उपयोग पर संज्ञान लेते हुए सभी राज्यों की नगरपालिकाओं से जवाब मांगा था।